मिट्टी का नाम मिट्टी शायद इसलिए पड़ा होगा क्योंकि अपना अस्तित्व मिटा देती है और उसे जिस आकार जिस रूप में ढालो ढल जाती है। जो मिट्टी अपने मूल रूप में एक हल्की सी फूंक से उड़ जाती है वही मिट्टी एक मूर्ति का आकार लेकर करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बन जाती है, वही मिट्टी एक दिए का रूप धरकर अंधेरा दूर करती है, वही मिट्टी एक घड़े की शक्ल में प्यासे को जीवनामृत पिलाती है। उसी प्रकार हम हैं इस विशाल ब्रह्मांड में मिट्टी के समान। समय की एक हल्की सी फूंक से कहां उड़ जाएं पता नहीं। लेकिन अगर हम अपने मैं अर्थात अहम् और इच्छा भाव को मिटा दें और परिस्थितियों के अनुसार ढल जाएं तो उस परम शक्ति के साथ तारतम्य बना सकते हैं। अपने अंतर को आलोकित करके एक सुंदर जीवन का निर्माण कर सकते हैं। स्मरण रखें कि परिस्थितियों को परिवर्तित करना हमारे बस में नहीं है, परन्तु विचारों को परिवर्तित अवश्य ही हमारे बस में है और विचारों को परिवर्तित करते ही परिस्थितियों के आकलन की हमारी दृष्टि में परिवर्तन आ जाएगा। मंगलमय दिवस की शुभकामनाओं सहित आपका मित्र :- भरत मल्होत्रा।

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