बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश वाले हिस्से में बसा पन्ना टाइगर रिजर्व का ये गाँव डोढन का यह प्राथमिक शाळा स्कूल है.यहाँ पिछले 5 जुलाई 2016 से मध्यान्ह भोजन नही बना है.स्कूल में पांच अध्यापक है जिनमे एक ही आता है जो इसी गाँव का रहवासी है और संविदा में 100 रूपये दिहाड़ी में काम करता है.ऐसे दस गाँव केन बेतवा लिक में विस्थापित होने है जो मूलतः आदिवासी गाँव है.बुनयादी विकास से वंचित ये गाँव जल,जंगल और जमीन के मध्य प्रकृति पर आश्रित है.

* बुन्देलखण्ड क्षेत्र के यूपी.एमपी में प्रस्तावित केन.बेतवा नदी लिंक प्राकृतिक आपदा है.Bundelkhand-water-crisis-1.jpg (768×576)

* केंद्र सरकार ने फारेस्ट एडवाइजरी कमेटी से वन्यभूमि अधिग्रहण करने की एनओसी प्राप्त की
* पर्यावरण मंत्रालय ने अभी मामले को उलझा रखा है उधर सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में टाइगर बफर जोन में बांध निर्माण की अनुमति देगी.
25 अगस्त 2005 से प्रस्तावित केन .बेतवा नदी गठजोड़ मुद्दे पर केंद्र और दोनों राज्य सरकारे अभी तक स्थानीय आदिवासी बाशिंदों के साथ सहमती नही बना पाई हैण् 8500 आबादी वाले आदिवासी डूब क्षेत्र के दस गाँव में अपने हिसाब से मुंह माँगा मुआवजा चाहते है। जबकि केंद्र सरकार मध्यप्रदेश पुनर्वास स्कीम के तहत बीपीएल आदिवासी विस्थापन के आंकलन पर मुआवजा देने की बात कर रही है। बांध के केंद्र बिंदु ग्राम दोधन पन्ना टाइगर्स तहसील बिजावर, जिला छतरपुर के पल्कोहा में रहनेवाले लोग 50 लाख रूपये प्रति परिवार आर्थिक मदद चाहते है जबकि खरयानी, कूपी मैनारी आदि 30 लाख रूपये की बात कह रहे है। सरकार न तो इतना मुआवजा देगी और न सहमती बन पायेगी। हाल .फिलहाल इस कार्यकाल में ये बांध बनता नही दिख रहा है. 31 सितम्बर 2015 को केन्द्रीय जलमंत्री उमा भारती अवश्य अपने कैबनेट के साथ जंगल में बांध स्थल दौधन ग्राम में लाल पत्थर लगवाकर शिलान्यास करने आई थी। बुंदेलखंड के लगातार पड़े तीन साल के सूखे ने केन नदी में गंगऊ डैम में भी पानी शेष नही छोड़ा है। बांध पर्यावरण प्रभाव आंकलन के अनुसारए 6 हजार हेक्टेयर में लगे लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाएंगे। पर्यावरण मंत्रालय ने अभी मामले को उलझा रखा है उधर सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में टाइगर बफर जोन में बांध निर्माण की अनुमति देगीण् जंगल के आदिवासी कहते है उन्हें जंगल से प्यार हैए वे लोग जंगल की रक्षा करते हैं। उनका मानना है कि इस योजना से जंगल को नुकसान होगा। वे अपने पन्ना टाइगर्स के रहवास को छोड़ना नही चाहते मगर वीरान होते जंगल और खतम होते वन्य जीवो के प्रवास के बीच सबको अपने .अपने हिस्से की कुरबानी करनी ही होगी क्योकि केंद्र सरकार को केन की हत्या चाहिए। बुंदेलखंड के हमीरपुर और झाँसी के रहवासी केन के पानी को बेतवा में डालने का समर्थन करके अलगाववाद की मानसिकता से ग्रस्त है। नेता चाहते भी यही है कि आवाम आपस में एकजुट न होने पाए। उन्हें बाँदा के बाशिंदों का सूखा नही दिखता है ए न आदिवासी विस्थापन दिखता हैए न पन्ना नेशनल पार्क के उजाड़ने का दर्पण एन वन्यजीवो का पलायन निज स्वार्थ में सियासी बाँध है ये और बुंदेलखंड के ईको सिस्टम से मजाक भी। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपने कार्यकाल में इस बांध को एनओसी नही दी थी तब उन्होंने पन्ना टाइगर्स के बड़े हिस्से को बांध एरिया में जाने पर सवाल किया था। सरकार ने जंगल में रहने वाले आदिवासियों को विकास का थोथा सब्जबाग दिखलाकर उन्हें भी मोबाइल,जींस और कंक्रीट के गलियारे में भटकने को रास्ता दिखला दिया है। देश की और बुंदेलखंड की प्रत्येक नदियाँ नैसर्गिक रूप से आपस में जुडी है फिर ये प्रकृति से खिलवाड़ क्यों मानवीय अतिक्रमण क्यों ? विकास के लिए जंगल के बाहर की जमीन क्या कम है. या धरती में अब सिर्फ आदमी ही रहना चाहता है.
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इस परियोजना से उजड़ जाएंगे कई गांव- 
इस परियोजना के विरुद्ध उठ रहे विरोध के स्वरों के बीच प्रवासनामा संवाददाता ने नदी गठजोड़ मुद्दे पर गंभीरता से अध्ययन किया है. आंकलन के मुताबिक केंद्र सरकार बुंदेलखंड के गांवों और जंगलों को उजाड़ कर खेत सींचने की तैयारी कर रही है जिसके सफल होने की उम्मीद कम है। परियोजना में न सिर्फ पन्ना टाइगर नेशनल पार्क का 6 हजार 258 हेक्टेयर वन्य इलाका इस योजना में अधिग्रहित कर लिया जाएगा बल्कि कई गांव भी उजड़ जाएंगे। नेशनल पार्क में कुल 24 बाघ हैं। पर्यावरण प्रभाव आंकलन के रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना के तहत आने वाले इलाके में जीव.जंतुओं की रिहाइश नहीं है लेकिन संवाददाता के अनुसार देश में बाघ बचाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैंए जबकि निश्चित रूप से बाघों का रिहाइशी इलाका प्रभावित होने के साथ ही दुनिया का बड़ा गिद्ध प्रजनन इलाका भी इस परियोजना के भेंट चढ़ेगा। सूचनाधिकार में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय वर्ष 2011 में कह चुका है कि बांध क्षेत्र के गाँव विस्थापित किये जा चुके है मगर असल में आज भी ये सभी गाँव जस की तस आबाद है. आदिवासी न जंगल छोड़ना चाहते है बिना उचित मुआवजे के और न बाँदा के लोग ये बांध के समर्थन में है. नदी के पानी को बेतवा में डालकर सियासत महज बुन्देली जनता को आपस में पानी की जंग के लिए मजबूर कर देगी. ग्यारह साल में सरकार और आदिवासी के बीच नही बन पाई सहमती।
कांग्रेस और भाजपा केंद्र सरकार के साए में पिछले ग्यारह साल से लटका है केन .बेतवा नदी गठजोड़ उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के जिस इलाके को पानी से तरबतर कर देने का दंभ भर रहा है यह गठजोड़ जरा देखे केन नदी की तलहटी में बसे बांध के केंद्र बिंदु ग्रेटर गंगऊ डैम ग्राम दौधन तहसील बिजावर जहाँ बाँध स्थल प्रस्तावित है उस गाँव में ही आज पेयजल का संकट है. पन्ना टाइगर्स डूब क्षेत्र के अन्दर आने वाले 6 गाँव के बीच दो कुयें है जिनमे पानी है। यहाँ आदिवासी रहवासी करीब 5 हजार से ऊपर कोंदर और गौड़ बसते है. इस जंगल में ही एक गाँव है पाठापुरा जहाँ तीन किलोमीटर दुर्गम घाटी से सुबह चार बजे नीचे आकर आदिवासी लड़कियां वापसी दोपहर बारह बजे तक पानी भरती है। वे स्कूल इसलिए नही जा पाती क्योकि उन्हें घर का पानी भरना होता है। आप विस्वास न करेंगे जिस घाटी में हम कैमरा लेकर न चढ़ पाए और गिरने का भय हो वहां ये लड़कियां कठपुतली की तरह तेज रफ्तार से ये काम बखूबी कर लेती है लेकिन इनका हुनर इनकी बेबसी की देन है जो उनको मजबूरी ने सिखलाया है। बिजावर के साथी अमित की माने तो ये बेटियां अपना दिन और रात पानी की दहशत में काट रही है। इन्हे ये डर लगता है कि डेरा में कोई बेटी न जन्मे बुंदेलखंड के लगातार पड़ रहे सूखे ने केन नदी का पानी बरियारपुर डैम और रनगवां के साथ गंगऊ में भी खतम कर दिया है। ग्राम दौधन का गंगऊ डैम साल 2015 में सूखा है और उससे जुड़ने वाले अन्य बांधो में भी पानी नही था। 24 मई 2017 को बांध क्षेत्र गंगऊ डैम पानी में नहीं है। विस्थापित होने वाले एमपी के छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के गाँव मैनारीए कूपी, खरयानी, पलकोहा, दौधन, वसुधा, भोरखुहा, घुघरी, शाहपुरा, सुकवाहा, आदिवासी गाँव है वही सरकार यह दावा कर रही है कि बाँध से 221 किलोमीटर लम्बी मुख्य नहर उत्तर प्रदेश के बरुआ सागर में जाकर मिलेगी इस नहर से 1074 एमसीएम पानी प्रति वर्ष भेजा जाएगा  659  एमसीएम पानी बेतवा नदी में पहुंचेगा।
ढोंडन बाँध के अलावा तीन और बाँध भी मध्य प्रदेश कि जमीन पर बेतवा नदी पर बनेंगे। रायसेन विदिशा जिले में बनने वाले मकोडिया बाँध से 5685 हेक्टेयर क्षेत्र मेंए बरारी बेराज से 2500 हेण्केसरी बेराज से 2880 हे. क्षेत्र में सिंचाई होगी लिंक नहर से मार्गों में 60294 हे. क्षेत्र सिंचित होगा . इसमे मध्यप्रदेश के 46599 हे. उत्तर प्रदेश के 13695 हे. क्षेत्र में सिचाई होगी। ढोंडन बाँध से छतरपुर और पन्ना जिले कि 323 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित होने का दावा भी किया जा रहा है ।
पानी की जंग के लिए तैयार हो रहे है बुंदेले. 
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24 मई को बांध क्षेत्र में दिल्ली से आये स्वामी आनंद स्वरुपए लखनऊ के आशीष तिवारी,अंशुमान दुबे ने प्रवासनामा  टीम के साथ यहाँ का भ्रमण किया है. आये हुए तीन साथी कहते है गत गर्मी की तरह आज भी यहाँ पानी का आकाल है ऐसा तब है जब बीते साल बारिश सही हुई है क्या ऐसे में ये लिंक अपने डीपीआर रिपोर्ट पर ही सवाल नही खड़ा करता है कि उपरी हिस्से में बह रही पहाड़ी नदी केन बड़ी नदी बेतवा को पानी कैसे दे पायेगी ? दो  नदियों का नेचर अलग है और फिर हर नदी आपस में पहले से जुड़ी है. आज भी बरियारपुर, रनगवां बांध सूखे है क्या इस बांध परियोजना की डीपीआर बुन्देलखण्ड के पारिस्थितिकी तंत्र का इसका स्थलीय अध्ययन किया गया है घ् इस बात पर भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता अजय दुबे इस बांध के बन जाने से बाघों के विस्थापन से चिंतित नजर आते हैबकौल अजय मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज ने पन्ना टाईगर रिजर्व के 640 हेण् इलाके को डूबाने वाली और बाघों के लिये घातक केन.बेतवा लिंक परियोजना को अनुमति देकर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड को भेजा। वन अधिकार अधिनियम मान्यता कानून 2006 का कोई उपयोग नहीं कर रहा। इस पूरे प्रोजेक्ट में न आदिवासी किसानो को प्लानिंग में शामिल किया गया जिनके लिए ये स्कीम है. न ही उन किसानो से पूछा गया. पर्यावरण कार्यकर्ता की मंशा को ध्यान में रखा गया है। केन्द्रीय जल मंत्री उमा भारती के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल ये लिंक फ़िलहाल तो महज वोट बैंक की खेती को काटने के लिए मोदी सरकार में 18 हजार करोड़ रूपये की होली जलाने का खाका लगता है फिर रुपया भी तो विश्व बैंक के कर्जे का कौन सा किसी राजनीतिक पार्टी की जेब से लगने जा रहा हैण् क्या इतने बड़े पर्यावरणीय हस्तक्षेप की जगह बुन्देलखण्ड को ठोस रोजगार का तोहफा नही दिया जा सकता था जिसकी यूपी,एमपी दोनों को दरकार है.

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