ज्योति सिंह

ज्योती सिंह: आज शिक्षा में काफी बदलाव आया है बच्चे पढाई में अपने ज्ञान को पाने के बजाय परेशानी महसूस कर रहे हैं. अभिभावक की चिंता है कि उनका बच्चा पढ़ता नहीं है और पढे़गा नहीं तो अच्छी नौकरी कैसे प्राप्त करेगा,फिर क्या उसकी चिंता दबाव में बदल जाती हैं. परिणामस्वरूप दोनों तनाव में रहते हैं, अच्छे अंक और पढाई पूरी कर अच्छी जाॅब उसका लक्ष्य बन जाता है. आज सारे बच्चे मेरिट बनाने के लिए ही पढ़ाई कर रहे है उनकी सफलता के पीछे कड़ी मेहनत गुरुजनों की प्रेरणा और माता पिता की तपस्या है लेकिन अफसोस होता है जब आप टाॅपर से पूछो की अपने देश के भविष्य को सुधारने के लिए क्या विचार रखते हो तो टाँपर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता है इसके लिए उन्हें बिल्कुल भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता उन्हें बचपन से ही बच्चों को जो शिक्षा दी जाती है उसमें शिक्षा को कॆवल अपनी संपन्नता और विकास का माध्यम ही बताया जाता है. पढ़ाई के बाद विदेश का सपना ही भारतीय मेधा का एक मात्र लक्ष्य बन गया है इस लक्ष्य के सामने देश और समाज को आगे ले जाने का उद्देश्य ही नहीं रखते हैं.आखिर हम पढ़ाई को लेकर इस कदर हावी हो जाते हैं कि बच्चे तो परेशान रहते ही हैं हम अपना सुख और चैन भी खो देते है. हमने भौतिकवादी युग के प्रति अपने को समर्पित कर अपने आत्मविशवास को खो दिया है. कभी कोई अपने से सवाल नहीं करता कि हम अपने बच्चों को क्या बनाना चाहते है. एक संस्कार युक्त बालक जो संवेदनशील होकर सबको आदर सम्मान दे और पा सके या फिर एक मशीन जो संवेदनशील बनकर सिर्फ पैसा कमाए जिसमें आधुनिकता का सारा गुण समाहित हो, यह सवाल खुद से न पूछने के कारण आज हम कई संकटो में पड़े हुए हैं अकेला परिवार जिसमें माता पिता का कोई स्थान नहीं! यह ठीक है कि प्रतिस्पर्धा होनी चाहिये पर सकारात्मक ऊर्जा के साथ. उतनी ही दौड़ लगाएँगे जितनी उनके अंदर क्षमता और शक्ति होगी और वे एक सार्थक परिणाम भी पाएँगे जिसमें न बेचैनी न निराशा और न आत्महत्या का भाव होगा सबसे अच्छी बात होगी कि भौतिकता में रहते हुए हम पैसा के पीछे  अपने संस्कारों को नहीं भूलेगे. बच्चों के पास अपनी एक क्षमता होती है और उसी क्षमता को पहचान कर आगे बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहीए न कि उसकी प्रतिभा से अलग करने का दबाव देना चाहिए जिसकी जो क्षमता होती है. उसी के अनुसार उसका विकास होता है हर इंसान की अपनी एक क्षमता होती है, जब हम उसकी क्षमता से अधिक पाने की लालसा रख लेते हैं तो एक दबाव रूपी राक्षस मन-मष्तिस्क पर हावी हो जाता है. (मार -मार कर गधे को घोड़ा नहीं बनाया जा सकता )जिस कारण हमारे सपने सपने ही रह जाते है और उस सपने को पाने के लिये हम जीवन उसके पीछे भागते रहते हैं लेकिन सफलता नहीं मिलती है. अच्छा है कि हम उसे तनावरहित एवं उसकी रुचि के अनुसार पढ़ने का मौका दे जिससे वह सफलता हासिल कर सके और हम एक मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका तय करे!

 

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